Worm types and symptoms of infection

Worm

आइए आज बात करते हैं कृमि के बारे में।जिसे अक्सर बच्चे काफी परेशान रहते हैं…

अक्सर मम्मिया शिकायत करती है कि मैं तो बच्चे को के खाने पीने का पूरा ध्यान रखती हूं। फिर भी बच्चे को खाना लगता ही नहीं कुछ भी खिलाओ इसका वजन और कद बढ़ता ही नहीं।दरअसल यह शिकायत पेट में कीड़े की वजह से हो सकती है। जिसे पहचानने की जरूरत है। ज्यादातर छोटे बच्चे को कृमि का संक्रमण होता है जिसके कारण ही उनका पोषण प्रभावित होता है जिससे उन्हें खून की कमी या एनेमिया भी हो सकता है इस पर विस्तार से बात करते हैं आज।

बच्चों में कृमि इन्फेक्शन या पेट में कृमि होना आम समस्या है जिसे अभिभावक अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। यह इन्फेक्शन कई तरह के कृमि से होता है जिन्हें मेडिकल टर्म में हेल्मिन्थ या आंत का कीड़ा कहा जाता है। यह वह वास्तव में पैरासाइट यह परजीवी होता है। जिसके अंडे लारवा या कीड़े मुंह से निगलने पर या नंगे पैर चलने से त्वचा में सीधे घुसकर किसी भी माध्यम से बच्चे के शरीर में पहुंच जाता है। बच्चे जो खाना खाते हैं उसके पोषण पाकर कृमि में बहुत तेजी से इनक्यूबेट या मल्टीपल होकर अपनी संख्या बढ़ाते हैं।धीरे-धीरे बच्चे के शरीर में दूसरे अंगों तक फैलकर इन्फेक्शन फैलाने लगता है।

क्योंकि यह कृमि बच्चे के शरीर में आंतों में ही नहीं खून में भी रहते हैं और उन से पोषण प्राप्त करते हैं। समुचित उपचार ना कराने पर आंतों में रक्तस्त्राव हो सकता है। जिससे बच्चे में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो जाती है। इनमें आयरन और प्रोटीन की कमी हो जाती है और वह एनीमिया का शिकार हो सकते हैं। भूख ना लगने के कारण उनमें पोषक तत्व की कमी और कमजोरी आ जाती है उसका वजन कम हो जाता है।टेपवॉर्म दिमाग तक पहुंचकर इंफेक्शन फैलाता है जिससे दिमाग में गांठे बनने लगती है और बच्चे का शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो जाता है।

22 करोड़ से अधिक भारतीय बच्चों 5 से 14 साल उम्र के बच्चे कृमि संक्रमण से प्रभावित हैं (WHO)

2015 में भारत में शुरू हुआ राष्ट्रीय कृमि निवारण अभियान 1 से 19 साल तक के बच्चों में कृमि मुक्त करने का उद्देश्य।
क्या है स्थिति :— विश्व स्वास्थ्य संस्था संगठन WHO के अनुसार दुनिया भर में तकरीबन 83 करोड़ बच्चे में परजीवी आंतों के कीड़े होने का खतरा है। भारत में 1 से 14 साल के उम्र के करीब 24 करोड़ बच्चे के पेट में कीड़े होने की समस्या से पीड़ित है।साफ सफाई रखने और खुले में शौच ना करने पर बल दिया गया है। इसके लिए देश भर के दूरदराज के इलाकों में शौचालयों का निर्माण भी किया गया है। भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 10 फरवरी को नेशनल डिवार्मिंग डे घोषित किया है।जिसका उद्देश्य 1 से 19 साल के बच्चों को कृमि मुक्त करना है। 2015 से यह अभियान भारत के सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत केंद्र स्वास्थ्य विभाग के आंगनबाड़ी, आशा कार्यकर्ता और अन्य वालेंटियर स्कूल, पंचायत, स्वास्थ्य केंद्र पर बच्चों को डिवार्मिंग की दवाई खिलाई जाती है।

कृमि के प्रकार व संक्रमण के लक्षण

पिनवॉर्म या थ्रडवार्म :— पिनवॉर्म मल द्वारा मुंह में फैलता है और ज्यादातर आंतों में मलाशय में रहता है। रात में मादा वार्म मलद्वार के आसपास ही त्वचा पर अंडे देने बाहर आती है। जिससे रात को सोते समय बच्चे अपने मलद्वार खुजलाते हैं। लार्वा उनकी उंगलियों में चिपक जाते है।गंदे हाथ से खाना खाने या पानी पीने से वार्म दुबारा मुंह में चले जाते हैं। उनकी साइकिलिंग होती रही है इसके अंडे कपड़े,बिस्तर पर भी जीवित रह सकते है। और छूने या सांस लेने पर अंदर चले जाते हैं।

लक्षण :— मरीज के पेट दर्द, रात को नींद नहीं आती, बेचैनी रहती है, मलद्वार में जलन,खुजली और उल्टी होने जैसी समस्या होती है।

हुक्वार्म :— लार्वा दूषित मिट्टी या जमीन पर मौजूद होते हैं बच्चे के नंगे पैर चलने से त्वचा में घुस के शरीर में पहुंच जाते हैं। फेफड़ों से होते हुए छोटी आंत की दीवारों पर चिपक जाते हैं जहां रक्त चूसते हैं।

लक्षण :— पेट में दर्द, भूख ना लगना, हीमोग्लोबिन की कमी से एनीमिया होना, वजन कम होना, खांसी शरीर में खुजली,रैसेज,दाने,स्वास संबंधी समस्याएं।

टेपवॉर्म :— बिना धुली फल सब्जियां, मांस मछली में पाए जाते हैं। इसे दूषित या अधपका भोजन खाने पर लार्वा शरीर में पहुंचकर आंतकी दीवार पर चिपक जाते हैं। पाचन प्रक्रिया गड़बड़ा जाती है। भूख कम हो जाती है जिससे बच्चे का वजन कम होता जाता है। समुचित उपचार ना किए जाने पर टेपवॉर्म रक्त प्रवाह के द्वारा दूसरे अंगों तक पहुंच जाता है।वहां त्वचा के नीचे द्रव से भरे सिस्ट बनाते हैं। जिसे सिस्टिसर्कोसिस कहा जाता है। दिमाग में लार्वा के जाने से न्यूरो-सिस्टिसर्कोसिस बीमारी हो जाती है। वॉर्म लिवर या फेफड़े में भी चले जाते हैं जहां जहरीले टॉक्सिन से भरे सिस्ट बनाते हैं जो फटने पर जानलेवा भी हो सकता है। इसे हाइडेटिड रोग कहा जाता है।

लक्षण :— मरीज को खांसी, पेट दर्द, उल्टी, कमजोरी, दस्त, डायरिया, रैशेज द्रव से भरे सिस्ट होते हैं।न्यूरो-सिस्टिसर्कोसिस होने पर बच्चे को मिर्गी का दौरा, सिरदर्द, उल्टी आदि हो सकते हैं।

राउंडवॉर्म :— कुत्ते बिल्ली आदि पालतू जानवरों के मल में पाए जाते हैं। मिट्टी में खेलने वाले बच्चे के हाथ पैर से चिपक जाते हैं। बिना हाथ धोए खाने पीने से बच्चे के शरीर में पहुंच जाते हैं और मल्टीपल होकर रक्त के साथ पूरे शरीर में फैल जाते है।कई मामलों में हाथ पैर की त्वचा के नीचे रेंगते हुए दिखाई देते हैं। इस बीमारी को क्यूटेनिया लार्वा माइग्रीन क्रीपिंग इरप्शन कहा जाता है

लक्षण :— बुखार, खांसी, जुकाम, तिल्ली, लीवर, फेफड़ों में सूजन, पूरी बॉडी में खुजली और दर्द।

कैसे होता है डायग्नोज

बच्चों में इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर पैरेंट्स को बिना देरी किए डॉक्टर को दिखाना चाहिए। ताकि बच्चा वार्ड में इंफेक्शन से बच सकें और उसके विकास में किसी तरह की रुकावट ना आये। इनफेक्शन की पुष्टि के लिए स्टूल टेस्ट, ब्लड टेस्ट,टेप टेस्ट, कार्टन स्वैब टेस्ट,इमेजिंग टेस्ट,फेकल टेस्ट और एंडोस्कोपी किये जाते है।

क्या है उपचार

वॉर्म–इंफेक्शन के उपचार के लिए बच्चों का एंटी-हेल्मिन्थिक्स ओरल दवाई दी जाती है। जिससे छह महीने बाद रिपीट किया जाता है।बच्चे की स्थिति के आधार पर एल्बेंडाजॉल या मेबेंडाजोल दी जाती है।एक साल से कम आयु के बच्चे को दवाई नहीं दी जाती । 1-2 साल के बच्चे को 400mg एल्बेंडाजॉल की आधी टेबलेट और 2– 19 साल के बच्चे को 400mg जी की एक टेबलेट दी जाती है।डेंपरिडोन, आनडस्ट्रॉन या मेट्रोलोजाइट मेडिसिन भी दी जाती है।
एहतियात के तौर पर बच्चों को साल में दो बार डिवॉर्मिंग की दवाई लेनी चाहिए।
वार्म-इंफेक्शन होने पर डॉक्टर पूरे परिवार को डिवार्मिंग दवाई का डोज लेने की सलाह भी दे सकते हैं।

नोट :— बीमारी है छोटी पर नजर अंदाज करने पर यह हमे बरी मुसिबतों में डाल सकती है।

free baby

आइए आज बात करते हैं कृमि के बारे में।जिसे अक्सर बच्चे काफी परेशान रहते हैं…

 

अक्सर मम्मिया शिकायत करती है कि मैं तो बच्चे को के खाने पीने का पूरा ध्यान रखती हूं। फिर भी बच्चे को खाना लगता ही नहीं कुछ भी खिलाओ इसका वजन और कद बढ़ता ही नहीं।दरअसल यह शिकायत पेट में कीड़े की वजह से हो सकती है। जिसे पहचानने की जरूरत है। ज्यादातर छोटे बच्चे को कृमि का संक्रमण होता है जिसके कारण ही उनका पोषण प्रभावित होता है जिससे उन्हें खून की कमी या एनेमिया भी हो सकता है इस पर विस्तार से बात करते हैं आज।

 

बच्चों में कृमि इन्फेक्शन या पेट में कृमि होना आम समस्या है जिसे अभिभावक अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। यह इन्फेक्शन कई तरह के कृमि से होता है जिन्हें मेडिकल टर्म में हेल्मिन्थ या आंत का कीड़ा कहा जाता है। यह वह वास्तव में पैरासाइट यह परजीवी होता है। जिसके अंडे लारवा या कीड़े मुंह से निगलने पर या नंगे पैर चलने से त्वचा में सीधे घुसकर किसी भी माध्यम से बच्चे के शरीर में पहुंच जाता है। बच्चे जो खाना खाते हैं उसके पोषण पाकर कृमि में बहुत तेजी से इनक्यूबेट या मल्टीपल होकर अपनी संख्या बढ़ाते हैं।धीरे-धीरे बच्चे के शरीर में दूसरे अंगों तक फैलकर इन्फेक्शन फैलाने लगता है।

 

क्योंकि यह कृमि बच्चे के शरीर में आंतों में ही नहीं खून में भी रहते हैं और उन से पोषण प्राप्त करते हैं। समुचित उपचार ना कराने पर आंतों में रक्तस्त्राव हो सकता है। जिससे बच्चे में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो जाती है। इनमें आयरन और प्रोटीन की कमी हो जाती है और वह एनीमिया का शिकार हो सकते हैं। भूख ना लगने के कारण उनमें पोषक तत्व की कमी और कमजोरी आ जाती है उसका वजन कम हो जाता है।टेपवॉर्म दिमाग तक पहुंचकर इंफेक्शन फैलाता है जिससे दिमाग में गांठे बनने लगती है और बच्चे का शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो जाता है।

 

22 करोड़ से अधिक भारतीय बच्चों 5 से 14 साल उम्र के बच्चे कृमि संक्रमण से प्रभावित हैं (WHO)

 

2015 में भारत में शुरू हुआ राष्ट्रीय कृमि निवारण अभियान 1 से 19 साल तक के बच्चों में कृमि मुक्त करने का उद्देश्य।

क्या है स्थिति :— विश्व स्वास्थ्य संस्था संगठन WHO के अनुसार दुनिया भर में तकरीबन 83 करोड़ बच्चे में परजीवी आंतों के कीड़े होने का खतरा है। भारत में 1 से 14 साल के उम्र के करीब 24 करोड़ बच्चे के पेट में कीड़े होने की समस्या से पीड़ित है।साफ सफाई रखने और खुले में शौच ना करने पर बल दिया गया है। इसके लिए देश भर के दूरदराज के इलाकों में शौचालयों का निर्माण भी किया गया है। भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 10 फरवरी को नेशनल डिवार्मिंग डे घोषित किया है।जिसका उद्देश्य 1 से 19 साल के बच्चों को कृमि मुक्त करना है। 2015 से यह अभियान भारत के सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत केंद्र स्वास्थ्य विभाग के आंगनबाड़ी, आशा कार्यकर्ता और अन्य वालेंटियर स्कूल, पंचायत, स्वास्थ्य केंद्र पर बच्चों को डिवार्मिंग की दवाई खिलाई जाती है।

 

कृमि के प्रकार व संक्रमण के लक्षण

 

पिनवॉर्म या थ्रडवार्म :— पिनवॉर्म मल द्वारा मुंह में फैलता है और ज्यादातर आंतों में मलाशय में रहता है। रात में मादा वार्म मलद्वार के आसपास ही त्वचा पर अंडे देने बाहर आती है। जिससे रात को सोते समय बच्चे अपने मलद्वार खुजलाते हैं। लार्वा उनकी उंगलियों में चिपक जाते है।गंदे हाथ से खाना खाने या पानी पीने से वार्म दुबारा मुंह में चले जाते हैं। उनकी साइकिलिंग होती रही है इसके अंडे कपड़े,बिस्तर पर भी जीवित रह सकते है। और छूने या सांस लेने पर अंदर चले जाते हैं।

 

लक्षण :— मरीज के पेट दर्द, रात को नींद नहीं आती, बेचैनी रहती है, मलद्वार में जलन,खुजली और उल्टी होने जैसी समस्या होती है।

 

हुक्वार्म :— लार्वा दूषित मिट्टी या जमीन पर मौजूद होते हैं बच्चे के नंगे पैर चलने से त्वचा में घुस के शरीर में पहुंच जाते हैं। फेफड़ों से होते हुए छोटी आंत की दीवारों पर चिपक जाते हैं जहां रक्त चूसते हैं।

 

लक्षण :— पेट में दर्द, भूख ना लगना, हीमोग्लोबिन की कमी से एनीमिया होना, वजन कम होना, खांसी शरीर में खुजली,रैसेज,दाने,स्वास संबंधी समस्याएं।

 

 

टेपवॉर्म :— बिना धुली फल सब्जियां, मांस मछली में पाए जाते हैं। इसे दूषित या अधपका भोजन खाने पर लार्वा शरीर में पहुंचकर आंतकी दीवार पर चिपक जाते हैं। पाचन प्रक्रिया गड़बड़ा जाती है। भूख कम हो जाती है जिससे बच्चे का वजन कम होता जाता है। समुचित उपचार ना किए जाने पर टेपवॉर्म रक्त प्रवाह के द्वारा दूसरे अंगों तक पहुंच जाता है।वहां त्वचा के नीचे द्रव से भरे सिस्ट बनाते हैं। जिसे सिस्टिसर्कोसिस कहा जाता है। दिमाग में लार्वा के जाने से न्यूरो-सिस्टिसर्कोसिस बीमारी हो जाती है। वॉर्म लिवर या फेफड़े में भी चले जाते हैं जहां जहरीले टॉक्सिन से भरे सिस्ट बनाते हैं जो फटने पर जानलेवा भी हो सकता है। इसे हाइडेटिड रोग कहा जाता है।

 

लक्षण :— मरीज को खांसी, पेट दर्द, उल्टी, कमजोरी, दस्त, डायरिया, रैशेज द्रव से भरे सिस्ट होते हैं।न्यूरो-सिस्टिसर्कोसिस होने पर बच्चे को मिर्गी का दौरा, सिरदर्द, उल्टी आदि हो सकते हैं।

 

राउंडवॉर्म :— कुत्ते बिल्ली आदि पालतू जानवरों के मल में पाए जाते हैं। मिट्टी में खेलने वाले बच्चे के हाथ पैर से चिपक जाते हैं। बिना हाथ धोए खाने पीने से बच्चे के शरीर में पहुंच जाते हैं और मल्टीपल होकर रक्त के साथ पूरे शरीर में फैल जाते है।कई मामलों में हाथ पैर की त्वचा के नीचे रेंगते हुए दिखाई देते हैं। इस बीमारी को क्यूटेनिया लार्वा माइग्रीन क्रीपिंग इरप्शन कहा जाता है

 

 लक्षण :— बुखार, खांसी, जुकाम, तिल्ली, लीवर, फेफड़ों में सूजन, पूरी बॉडी में खुजली और दर्द।

 

कैसे होता है डायग्नोज

 

बच्चों में इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर पैरेंट्स को बिना देरी किए डॉक्टर को दिखाना चाहिए। ताकि बच्चा वार्ड में इंफेक्शन से बच सकें और उसके विकास में किसी तरह की रुकावट ना आये। इनफेक्शन की पुष्टि के लिए स्टूल टेस्ट, ब्लड टेस्ट,टेप टेस्ट, कार्टन स्वैब टेस्ट,इमेजिंग टेस्ट,फेकल टेस्ट और एंडोस्कोपी किये जाते है।

 

   क्या है उपचार

 

वॉर्म–इंफेक्शन के उपचार के लिए बच्चों का एंटी-हेल्मिन्थिक्स ओरल दवाई दी जाती है। जिससे छह महीने बाद रिपीट किया जाता है।बच्चे की स्थिति के आधार पर एल्बेंडाजॉल या मेबेंडाजोल दी जाती है।एक साल से कम आयु के बच्चे को दवाई नहीं दी जाती । 1-2 साल के बच्चे को 400mg एल्बेंडाजॉल की आधी टेबलेट और 2– 19 साल के बच्चे को 400mg जी की एक टेबलेट दी जाती है।डेंपरिडोन, आनडस्ट्रॉन या मेट्रोलोजाइट मेडिसिन भी दी जाती है।

एहतियात के तौर पर बच्चों को साल में दो बार डिवॉर्मिंग की दवाई लेनी चाहिए।

वार्म-इंफेक्शन होने पर डॉक्टर पूरे परिवार को डिवार्मिंग दवाई का डोज लेने की सलाह भी दे सकते हैं।

 

नोट :— बीमारी है छोटी पर नजर अंदाज करने पर यह हमे बरी मुसिबतों में डाल सकती है।

 

One Comment on “Worm types and symptoms of infection”

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