Haemophilia disease

Hemophilia disease

हीमोफीलिया:—वंशानुगत रक्त विकार है जिसमें कटने या चोट लगने पर खून बिना रुके लगातार बहता है। कई बार यह बिल्डिंग खुद शुरू हो जाती है। इस रोग में जोड़ों में सूजन विशेषकर घुटनों, कोहली और टखनों में सूजन की समस्या रहती है। हालांकि पीड़ित के शरीर में कहीं भी ब्लीडिंग हो सकती है। जैसे मस्तिष्क, मसूड़े और नाक, त्वचा में बिल्डिंग होने पर वहां पर सफेद या लाल चकत्ते पड़ जाते हैं। गंभीर होमेफीलिया में तेज झटके से भी शरीर में अंदरूनी रक्तस्त्राव शुरू हो सकता है।

NCBI(एनसीबीआई) की रिपोर्ट के अनुसार लगभग भारत में 100000 से अधिक लोग इस रोग से पीड़ित हैं।प्रति 10 हजार शिशु जन्म में से एक इसे प्रभावित होता है। जागरूकता के अभाव में करीब 80% रोगियों में इसका पता नहीं चलता।

 

जिम्मेवार कारक:— हीमोफीलिया रोग शिशु को माता-पिता से विरासत में मिलती है। दरअसल यह बीमारी X जीन पर निर्भर करती है। इसलिए यदि कोई लड़का इस बीमारी से ग्रस्त है तो उसे यह बीमारी मां से मिली है। वहीं एक लड़की में या बीमारी पीड़ित पिता के कारण होती है।हालांकि हीमोफीलिया में एक तिहाई मामले के अनुसार यह बीमारी पीड़ितों में क्लॉटिंग फैक्टर की कमी के कारण खुद विकसित हुई ऐसे में जरूरी नहीं कि इसे पीड़ित हर व्यक्ति इसका परिवारिक इतिहास रखता हो।

 

हीमोफीलिया A और B :—या बीमारी खून में क्लॉटिंग फैक्टर की कमी के कारण होता है। खून में थक्के न बन पाने से खून रुकना मुश्किल हो जाता है। आमतौर पर दो प्रकार के फैक्टर की कमी के मामले ज्यादा देखने को मिलते हैं। इन्हें होमोफीलिया ए और बी के नाम से जाना जाता है। हीमोफीलिया सेक्टर 8 की कमी से होता है और हीमोफीलिया बी सेक्टर 9 की कमी के कारण होता है।

 

दरअसल इसका इलाज संभव नहीं उपलब्ध सप्लीमेंट की मदद से इस फैक्टर की कमी को पूरा किया जा सकता है। वहीं महिलाओं की तुलना में पुरुषों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। इस रोग में लक्षणों के आधार पर भी सभी चिकित्सक व वैज्ञानिक पहलुओं पर उपचार कर रोगी का जीवन आसान बना सकता है।

  रोग के लक्षण

1. चोट लगने पर खून का भाव ना बंद होना।

2. अक्सर नाक से खून आना।

3. शरीर में नीले चकत्ते पड़ना और मल के साथ खून।

4. मसूड़ों और जीव के कटने पर लंबे समय तक खून का बहना।

5. किसी भी अंग विशेषकर जोड़ों में बार-बार सूजन रहना।

 

रोकथाम और बचाव

1. सप्लीमेंट लेते रहे और व्यायाम करें।

2. कहीं भी जाते समय फर्स्ट एड का इंतजाम रखें।

एस्परिन और ब्रुफेन व वॉवरन नॉन स्टेरॉइड एंटी इंफ्लेमेटरी जैसी दवाइयाँ खाने से बचे।

3. डेस्मोप्रोसिन माइल्ड हिमोफीलिया ए में सहायक होता है।

4. हेपेटाइटिस ए और बी का टीका लगवाएं।

फैमिली हिस्ट्री होने पर प्रेगनेंसी के दौरान डॉक्टर को जानकारी दें और टेस्ट कराएं।

आईसीएमआर ने बनाई सस्ती किट 

हीमोफीलिया ए और खून से जुड़ी दूसरी बीमारियों का पता लगाने के लिए भारत में दुनिया की सबसे सस्ती और पहली बार रैपिड डायग्नोस्टिक किट आईसीएमआर ने तैयार की है और इसका पेटेंट भी हासिल कर लिया है। पहले यह टेस्ट 5 से 10 हजार में होती थी जो अब ₹50 में कराई जा सकती है खून की बूंद पेपर पर डालने के बाद 10 मिनट में रिजल्ट मिल जाता है।

नोट :— कई बीमारियां ऐसी है जिसका मेडिकल साइंस में इलाज नहीं पर उसका इलाज हम खुद कर सकते हैं और वह इलाज है खुद को परहेज करके।

 

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