Arthritis

                                             Arthritis

जोड़ों के सूजन को अर्थराइटिस कहते हैं दर्द अकड़न और जोड़ों में सूजन अर्थराइटिस के प्रमुख कारण है दर्द अकड़न जोर की गति में कमी और विकृति मांसपेशियों में सूजन और दुर्बलता तथा व्यक्ति विशेष की कार्य क्षमता में कमी हर एक प्रकार के अर्थराइटिस में पाया जाता है इन सभी परेशानियों का समाधान हम फिजियोथेरेपी और जीवनशैली में बदलाव से कर सकते हैं।

 

Physiotherapy is effective

दर्द निवारक दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके ज्यादा इस्तेमाल से पेप्टिक अल्सर व किडनी की गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकता है।

कई तरह के फिजियोथेरेपी से हम अर्थराइटिस के दर्द का इलाज कर सकते हैं और इससे कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता।

 

 

 

जैसे:— इंटेरफेरेंसीएल थेरेपी, अल्ट्रासाउंड फोनोफोरेसिस, टेंस,लेजर, पलस इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एनर्जी, पल्स डायथर्मी, माइक्रोवेव थेरेपी, हाइड्रोथेरेपी, कार्योथेरेपी।

 

इन सब फिजियोथेरेपी से अगर हम अर्थराइटिस का इलाज करें तो ज्यादा बेहतर होगा हमारे लिए।

 

व्यायाम और फिजियोथैरेपिस्ट द्वारा उपयोग की जाने वाली अनेकों प्रकार की मैनुअल तकनीक अर्थराइटिस की जकड़न विकृति और मांसपेशियों की दुर्बलता दूर करने में कारगर साबित हुआ है। विकृति की रोकथाम और ठीक करने में सहायक उपकरणों या ऑर्थोसिस की अहम भूमिका होती है। इसके प्रयोग से जोरों पर पड़ रहे अत्यधिक दबाव को कम किया जाता है जिससे दर्द कम होने के साथ-साथ व्यक्ति की कार्यक्षमता में भी सुधार होता है और दवा खाने की जरूरत भी काफी कम हो जाती है।

 

अर्थराइटिस के इलाज में जीवन शैली में बदलाव और ज्वाइन प्रोटेक्शन की तकनीकी का प्रयोग बहुत जरूरी होता है। सीढियां चढ़ना या फिजियोथैरेपिस्ट द्वारा बताए तरीके से सीढ़ियां चढ़ना, जमीन पर उकङू न बैठना, शौचालय में कमोड का इस्तेमाल करना, ज्यादा देर तक एक अवस्था में ना रहना आदि काफी लाभदायक है।

 

ध्यान रखने योग्य बातें:—

 

अर्थराइटिस की शुरुआती अवस्था में ही फिजियोथैरेपिस्ट से मिलना चाहिए। क्योंकि ऐसा देखा गया है कि जब तक मरीज फिजियोथैरेपिस्ट के पास पहुंचता तब तक उनके जोर विकृत हो चुके होते हैं। और उन्हें काफी परेशानियों का और दर्द का सामना करना पड़ता है। और अर्थराइटिस के संपूर्ण इलाज में दवा के अलावा व्यायाम, फिजियोथैरेपी तकनीक और उपकरण, ऑर्थोसिस, खानपान, जीवनशैली में परिवर्तन, मानसिक अवस्था में बदलाव तथा परिवेश में बदलाव आदि का ज्यादा महत्वपूर्ण योगदान होता है।

 

सही समय पर फिजियोथैरेपी ना सिर्फ मरीज की दिनचर्या को वापस पटरी पर ला सकती है बल्कि शल्य चिकित्सा या ज्वाइंट रिप्लेसमेंट में होने वाले दर्द और आर्थिक क्षति से भी बचा सकती है।

 

जोड़ों के मूवमेंट को सामान्य बनाए रखने के लिए रेंज ऑफ मोशन की अलग-अलग तरह की एक्सरसाइज करनी चाहिए इस तरह की एक्सरसाइज की मदद से शरीर में लचीलापन बना रहता है।

 

इन रेंज ऑफ मोशन एक्सरसाइज को नियमित रूप से करना चाहिए अगर समय की कमी हो तो कम से कम 1 दिन छोड़ 1 दिन जरूर करना चाहिए।

जब भी आप अलग-अलग तरह के मोशन एक्सरसाइज करें तो स्ट्रैचिंग और वार्म-अप करना नहीं भूले । वार्म-अप और स्टिचिंग से हमारे शरीर में लचीलापन बना रहता है और जोड़ों के दर्द में भी कमी होती रहती है।

 

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